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विदेशी अधिकारिता अधिनियम 1947

विदेशी अधिकारिता अधिनियम, 1947 (1947 काअधिनियमसंख्यांक 47) [24 दिसम्बर, 1947] केन्द्रीयसरकारकीकुछ 1[विदेशी] अधिकारिताकेप्रयोगकाउपबंध उपबंधकरनेकेलिए अधिनियम

केन्द्रीय सरकार को संधि, करार, अनुदान, प्रथा, सहन और अन्य विधियुक्त साधनों से भारत 2॥। के बाहर के क्षेत्रों में और उनके सम्बन्ध में अधिकारिता है या केन्द्रीय सरकार इसके पश्चात् ऐसी अधिकारिता अर्जित कर सकती है;

अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:

1. संक्षिप्तनाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 1[विदेशी] अधिकारिता अधिनियम, 1947 है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में,

(क) “1[विदेशी] अधिकारिता” से कोई ऐसी अधिकारिता अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार को संधि, करार, अनुदान, प्रथा, सहन या अन्य विधियुक्त साधनों से 3[भारत] के बाहर के क्षेत्रों में से या उनके संबंध में हैं;

(ख) “अधिकारिता” के अन्तर्गत अधिकार, शक्ति और प्राधिकार भी हैं ।

3. अधिकारिताकाप्रयोग-(1) केन्द्रीय सरकार के लिए 1[विदेशी] अधिकारिता का प्रयोग, ऐसी रीति से करना विधियुक्त होगा जैसा वह ठीक समझे ।

(2) केन्द्रीय सरकार यथापूर्वोक्त कोई ऐसी अधिकारिता किसी अधिकारी या प्राधिकारी को ऐसी रीति से और ऐसे परिमाण तक, जैसा वह ठीक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगी ।

4. आदेशदेनेकीशक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे आदेश दे सकेगी जो वह केन्द्रीय सरकार की किसी 1[विदेशी] अधिकारिता के प्रभावी प्रयोग के लिए समीचीन समझे ।

(2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उस उपधारा के अधीन दिए गए किसी आदेश में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किए जा सकेंगे

(क) अनुपालन किए जाने के लिए विधि और प्रक्रिया का अवधारण करना, चाहे वह किसी राज्य में प्रवृत्त किसी अधिनियम के सभी या उनमें से किसी उपबन्ध को उपान्तरों के साथ या उनके बिना लागू करके हो या अन्यथा;

(ख) उन व्यक्तियों का अवधारण करना जिन्हें या तो सामान्यतया या विशिष्ट मामलों या मामलों के वर्गों में अधिकारिता का प्रयोग करना है, तथा उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियों का अवधारण करना है;

(ग) न्यायालयों, न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और प्राधिकारियों का अवधारण करना जिनके द्वारा और ऐसी रीति का विनियमन करना जिसमें कि इस अधिनियम के अधीन प्रयुक्त अधिकारिता की सहायक या आनुषंगिक या पारिणामिक किसी अधिकारिता का किसी राज्य के अन्दर प्रयोग करना है ; और

(घ) फीस की रकम, उसके संग्रहण और उसके उपयोजन का विनियमन करना ।

  1. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रांतीय बाह्य के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  2. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा के प्रांतो शब्दों का लोप किया गया ।
  3. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रांतों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  4. ऐसे प्रत्यायोजन के लिए देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1948, भाग 1, पृ० 358 और 431 ।
  5. ऐसी अधिसूचनाओं के लिए देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1948, भाग 1, पृ० 44, 80, 201, 248, 281, 335, 336, 433, 454, 455 और उपरोक्त, असाधारण (अंग्रेजी), पृ० 75 ।

5. अधिकारिताकेअनुसरणमेंकिएगएकार्यकीविधिमान्यता3[भारत] के बाहर किसी क्षेत्र में केन्द्रीय सरकार की किसी 1[विदेशी] अधिकारिता के अनुसरण में किया गया प्रत्येक कार्य और की गई प्रत्येक बात, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ के पहले या बाद में किया गया या की गई हो, इस प्रकार विधिमान्य होगा या होगी मानो वह उस क्षेत्र में तत्समय प्रवत्त स्थानीय विधि के अनुसार किया गया हो या की गई हो ।

6. अधिकारिताकेअस्तित्वयाउसकेविस्तारकासाक्ष्य-(1) 3[भारत] के अन्दर या 3[भारत] के बाहर केन्द्रीय सरकार के प्राधिकार द्वारा स्थापित किसी न्यायालय में किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही में यदि केन्द्रीय सरकार की किसी 1[विदेशी] अधिकारिता के अस्तित्व या विस्तार के बारे में कोई प्रश्न उठता है तो भारत सरकार के समुचित विभाग का सचिव, न्यायालय के अनुरोध पर, उस प्रश्न पर केन्द्रीय सरकार का विनिचय न्यायालय को भेजेगा और वह विनिश्चय उस कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए अंतिम होगा ।

(2) वह न्यायालय, न्यायालय की मुद्रा लगे या न्यायालय के न्यायाधीश से हस्ताक्षरित पत्र द्वारा उक्त सचिव को स्पष्ट प्रश्न बना कर भेजेगा जिनसे वह उचित रूप से प्रकट हो, और उक्त सचिव उन प्रश्नों के पर्याप्त उत्तर न्यायालय को प्रेषित करेगा और प्रस्तुत किए जाने पर वे उत्तर उनमें अन्तर्विष्ट मामलों के निश्चायक साक्ष्य होंगे ।

7. निरसनऔरव्यावृत्ति-(1) एक्सट्रा प्रोविंशियल जूरिसडिक्शन आर्डिनेंस, 1947 (1947 का 15) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

(2) उक्त आर्डिनेंस द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करते हुए दिए गए किसी आदेश या की गई किसी बात या कार्रवाई के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में इस प्रकार दिया गया या की गई है मानो यह अधिनियम 27 अगस्त, 1947 को प्रारम्भ हो गया हो ।

Note : सभी तरह के एक्ट देखने और समझकर सरल माध्यम से समझाने लिए IPC का सहारा लिया गया है और आप भी भारतीय न्याय व्यवस्था में अपना भरोसा बनाकर इन्हें पढ़े और ज्यादा बेहतर समझ के लिए किसी अच्छे वकील से संपर्क करें. यदि आपको कोई त्रुटी मिले तो comment करके हमें बताये हम जुरूर सुधारने का प्रयास करेंगे. आर्टिकल या पोस्ट में लिखी किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे.
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