गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम 1994

गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम 1994

भारत गणराज्य के पैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: —

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ–(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 1[गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध)] अधिनियम, 1994 है । 

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।  

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं–इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, —

(क) समुचित प्राधिकारी” से धारा 17 के अधीन नियुक्त समुचित प्राधिकारी अभिप्रेत है; 

(ख) बोर्ड” से धारा 7 के अधीन गठित केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड अभिप्रेत है; 

 [(खक) गर्भ उत्पाद” से गर्भाधान से जन्म होने तक विकास के किसी भी प्रक्रम पर गर्भधारण का कोई उत्पाद अभिप्रेत है, जिसमें अतिरिक्त भ्रूण-झिल्ली तथा भ्रूण या गर्भ सम्मिलित है; 

(खख) भ्रूण” से गर्भाधान के पश्चात् आठ सप्ताह (छप्पन दिन) के अंत तक कोई विकासोन्मुख मानव जीव अभिप्रेत है; 

(खग) गर्भ’ से गर्भाधान या सृजन से अनुगामी सत्तावनवें दिन से प्रारंभ होकर (जिसमें कोई ऐसा समय अपवर्जित करके जिसमें उसका विकास निलंबित रहा हो) और जन्म पर समाप्त होने वाली इसकी विकास की अवधि के दौरान कोई मानव जीव अभिप्रेत है;]

(ग) आनुवंशिकी सलाह केन्द्र” से रोगियों को आनुवंशिकी सलाह देने के लिए कोई संस्था, अस्पताल, परिचर्यागृह या कोई स्थान, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है; 

(घ) आनुवंशिकी क्लिनिक” से अभिप्रेत है, कोई क्लिनिक, संस्था, अस्पताल, परिचर्यागृह या कोई स्थान, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, जिसका प्रसवपूर्व निदान प्रक्रियाएं करने के लिए उपयोग किया जाता है ।

 [स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, आनुवंशिकी क्लिनिक” में कोई ऐसा यान सम्मिलित है जिसमें अल्ट्रासाउंड मशीन या इमेजिंग मशीन या स्कैनर अथवा ऐसे अन्य उपस्कर का जो गर्भ के लिंग का अवधारण करने में सक्षम हो या किसी ऐसे वहनीय उपस्कर का जो गर्भावस्था के दौरान लिंग का पता लगाने के लिए या गर्भधारण से पूर्व लिंग चयन के लिए समक्ष है, उपयोग किया जाता है;]

(ङ) आनुवंशिकी प्रयोगशाला” से कोई प्रयोगशाला अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा स्थान भी है जहां आनुवंशिकी क्लिनिक से प्रसवपूर्व निदान-परीक्षण के लिए प्राप्त नमूनों का विश्लेषण या परीक्षण करने की सुविधाएं दी जाती है ।

1[स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए आनुवंशिकी प्रयोगशाला” में कोई ऐसा स्थान सम्मिलित है, जहां अल्ट्रासाउंड मशीन या इमेजिंग मशीन या स्कैनर अथवा ऐसे अन्य उपस्कर का, जो गर्भ के लिंग का अवधारण करने में सक्षम है या किसी ऐसे वहनीय उपस्कर का जो गर्भावस्था के दौरान लिंग का पता लगाने या गर्भधारण से पूर्व लिंग चयन करने में समक्ष है, उपयोग किया जाता है;] 

(च) स्त्री रोग विशेषज्ञ” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास स्त्री रोग विज्ञान और प्रसूति विज्ञान में स्नातकोत्तर अर्हता है;

 [(छ) चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञ” में ऐसा व्यक्ति सम्मिलित है जिसके पास लिंग चयन और प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों के क्षेत्रों में आनुवंशिकी विज्ञान में कोई उपाधि या डिप्लोमा है या निम्नलिखित अर्हता अभिप्राप्त करने के पश्चात् इनमें से किसी क्षेत्र में कम से कम दो वर्ष का अनुभव है: —

(i) भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) के अधीन मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हताओं में से कोई; या

(ii) जैव-विज्ञान में कोई स्नातकोत्तर उपाधि;]

(ज) बाल चिकित्सक” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास बाल चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर अर्हता है; 

2[(झ) प्रसवपूर्व निदान प्रक्रिया” से अभिप्रेत है सभी स्त्री रोग संबंधी या प्रसूति विज्ञान संबंधी या चिकित्सा संबंधी प्रक्रियाएं, जैसे कि पराश्रव्य लेखन, भ्रूण दार्शिकी, गर्भधारण के पूर्व या पश्चात् लिंग चयन के लिए, किसी प्रकार के किसी विश्लेषण या प्रसवपूर्व निदान परीक्षण के लिए, किसी पुरुष या स्त्री के, उल्व-तरल, जरायु अंकुरिका, भ्रूण, रक्त या किसी अन्य टिशू या तरल का किसी आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक में भेजने के लिए नमूना लेना या निकालना ;]

(ञ) प्रसवपूर्व निदान-तकनीक” के अन्तर्गत सभी प्रसवपूर्व निदान प्रक्रियाएं और प्रसवपूर्व निदान परीक्षण हैं; 

2[(ट) प्रसवपूर्व निदान परीक्षण” से किसी गर्भवती स्त्री या गर्भ उत्पाद के आनुवंशिकी या मेटाबोली विकारों या गुणसूत्री अप्रसामान्यताओं या जन्मजात असंगतियों या हीमोग्लोबिन विकृतियों या लिंग सहलग्न रोगों का पता लगाने के लिए किया गया पराश्रव्य लेखन या उसके उल्व-तरल, जरायु अंकुरिका, रक्त या किसी टिशू या तरल का कोई परीक्षण या विश्लेषण अभिप्रेत है;]

(ठ) विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; 

(ड) रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी” से ऐसा चिकित्सा व्यवसायी अभिप्रेत है, जिसके पास भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की धारा 2 के खंड (ज) में परिभाषित कोई मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता है और जिसका नाम राज्य चिकित्सा रजिस्टर में प्रविष्ट है; 

(ढ) विनियम” से इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा विरचित विनियम अभिप्रेत है; 

1[(ण) लिंग चयन” के अंतर्गत इस बात को सुनिश्चित करने या उसकी संभाव्यता को वर्धित करने के प्रयोजन के लिए कि भ्रूण किसी विशिष्ट लिंग का होगा कोई प्रक्रिया, तकनीक, परीक्षण या कोई प्रयोग या नुस्खा या व्यवस्था है; 

(त) सोनोलोजिस्ट या चित्रण विशेषज्ञ” से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) के अधीन मान्यताप्राप्त कोई चिकित्सा अर्हता है या जिसके पास पराश्रव्य लेखन या इमेजिंग तकनीकों या विकिरण विज्ञान में कोई स्नातकोत्तर अर्हता है; 

(थ) राज्य बोर्ड” से धारा 16क के अधीन गठित कोई राज्य पर्यवेक्षण बोर्ड या कोई संघ राज्यक्षेत्र पर्यवेक्षण बोर्ड अभिप्रेत है;

(द) विधान-मंडल वाले संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार” से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त उस संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है ।]

अध्याय 2

आनुवंशिकी सलाह केन्द्रों, आनुवंशिकी प्रयोगशालाओं और आनुवंशिकी क्लिनिकों का विनियमन

3. आनुवंशिकी सलाह केन्द्रों, आनुवंशिकी प्रयोगशालाओं और आनुवंशिकी क्लिनिकों का विनियमन–इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, —

(1) कोई भी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक जब तक कि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत न हो, प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों से संबंधित कोई क्रियाकलाप नहीं करेगा या ऐसे क्रियाकलापों के किए जाने में सहबद्ध या सहायक नहीं होगा । 

 [(2) कोई भी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र या आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक किसी ऐसे व्यक्ति को जिसके पास ऐसी अर्हताएं, जो विहित की जाएं, नहीं हैं, मानार्थ या संदाय पर नियोजित नहीं करेगा या नियोजित नहीं कराएगा या उसकी सेवाएं नहीं लेगा ।]

(3) कोई भी चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल चिकित्सक, रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी या कोई अन्य व्यक्ति, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्थान से भिन्न किसी स्थान पर कोई प्रसवपूर्व निदान-तकनीक प्रक्रिया स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से उपयोग नहीं करेगा या नहीं कराएगा या उसके उपयोग में सहायता नहीं करेगा । 

 [3क. लिंग चयन पर प्रतिषेध–कोई व्यक्ति, जिसमें बंध्यता के क्षेत्र में कोई विशेषज्ञ या विशेषज्ञों का दल सम्मिलित है, किसी स्त्री या किसी पुरुष या दोनों पर अथवा उनमें से किसी से या दोनों से लिए गए किसी टिशू, भ्रूण गर्भ उत्पाद, तरल या गेमीट पर स्वयं लिंग चयन नहीं करेगा या किसी अन्य व्यक्ति से नहीं कराएगा अथवा ऐसा करने में स्वयं सहायता नहीं करेगा या किसी अन्य व्यक्ति से सहायता नहीं लेगा ।

3ख. ऐसे व्यक्तियों, प्रयोगशालाओं, क्लिनिकों, आदि को, जो अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं, पराश्रव्य मशीन के विक्रय पर प्रतिषेध–कोई व्यक्ति ऐसे किसी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला, आनुवंशिकी क्लिनिक या किसी अन्य व्यक्ति को जो अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत नहीं है, पराश्रव्य मशीन, इमेजिंग मशीन या स्कैनर या भ्रूण के लिंग का पता लगाने के लिए सक्षम किसी अन्य उपस्कर का विक्रय नहीं करेगा ।]

अध्याय 3

प्रसवपूर्व निदान तकनीकों का विनियमन

4. प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों का विनियमन–इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, — 

(1) ऐसे किसी भी स्थान का, जिसके अन्तर्गत रजिस्ट्रीकृत आनुवंशिकी सलाह केन्द्र या आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक है, किसी व्यक्ति द्वारा, खंड (2) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों और खंड (3) में विनिर्दिष्ट किन्हीं बातों को पूरा करने के पश्चात् के सिवाय, प्रसवपूर्व निदान-तकनीक प्रक्रिया करने के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा अथवा उपयोग नहीं कराया जाएगा । 

(2) कोई भी प्रसवपूर्व निदान-तकनीक का निम्नलिखित अप्रसामान्यताओं में से किसी का पता लगाने के प्रयोजनों के सिवाय, उपयोग नहीं किया जाएगा :–

(i) गुणसूत्री अप्रसामान्यताएं;

(ii) आनुवंशिकी मेटाबोली रोग;

(iii) हीमोग्लोबिन विकृतियां;

(iv) लिंग सहलग्न आनुवंशिकी रोग;

(v) जन्मजात असंगतियां;

(vi) ऐसी कोई अप्रसामान्यताएं या रोग जो केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

                 [(3) किसी भी प्रसवपूर्व निदान-तकनीक का उपयोग या परिचालन तभी किया जाएगा जब ऐसा करने के लिए अर्हित व्यक्ति का उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि निम्नलिखित किसी शर्त की पूर्ति हो गई है, अर्थात्: —

(i) गर्भवती स्त्री की आयु पैंतीस वर्ष से अधिक है;

(ii) गर्भवती स्त्री के दो या दो से अधिक स्वतः गर्भपात हुए हैं या भ्रूण हानि हुई है;

(iii) गर्भवती स्त्री, विभव विरुपजनकों, जैसे कि ओषधियों, विकिरणों, संक्रमण या रसायनों से प्रभावित हुई है;

(iv) गर्भवती स्त्री या उसके पति के कुटुम्ब में मानसिक मंदता या शारीरिक विरूपिता जैसे कि संस्तम्भता या किसी अन्य आनुवंशिकी रोग का परिवार वृत है;

(v) कोई अन्य शर्त जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए:

परंतु किसी गर्भवती स्त्री पर पराश्रव्य लेखन करने वाला व्यक्ति क्लिनिक में ऐसी रीति में जो विहित की जाए, उसका पूरा अभिलेख रखेगा और उसमें पाई गई कोई कमी या अशुद्धि या धारा 5 या धारा 6 के उपबंधों का उल्लंघन मानी जाएगी जब तक कि ऐसा पराश्रव्य लेखन करने वाला व्यक्ति उसके विपरीत साबित नहीं कर देता है ।

(4) कोई व्यक्ति जिसमें गर्भवती स्त्री का नातेदार या पति सम्मिलित है, खंड (2) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के सिवाय, उस पर किसी प्रसवपूर्व निदान-तकनीक का उपयोग नहीं कराएगा या उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा । 

(5) कोई व्यक्ति जिसमें किसी स्त्री का कोई नातेदार या पति सम्मिलित है, उस स्त्री पर या उसके नातेदार या पति पर या दोनों पर किसी लिंग चयन करने वाली तकनीक का प्रयोग नहीं कराएगा या कराने के लिए उन्हें प्रोत्साहित नहीं करेगा ।]

5. गर्भवती स्त्री की लिखित सहमति और भ्रूण के लिंग की संसूचना का प्रतिषेध–(1) धारा 3 के खंड (2) में निर्दिष्ट कोई भी व्यक्ति, प्रसवपूर्व-निदान प्रक्रियाओं का उपयोग तब करेगा जब– 

(क) उसने संबंधित गर्भवती स्त्री को ऐसी प्रक्रियाओं के सभी ज्ञात अनुषंगी प्रभावों और अनुवर्ती प्रभावों को स्पष्ट कर दिया हो; 

(ख) उसने ऐसी प्रक्रियाएं कराने की उसकी लिखित सहमति ऐसी भाषा में, जो वह समझती है; विहित प्ररूप में प्राप्त कर ली हो; 

(ग) खंड (ख) के अधीन प्राप्त उसकी लिखित सहमति की प्रति गर्भवती स्त्री को दे दी हो । 

 [(2) कोई व्यक्ति, जिसमें प्रसवपूर्व निदान-प्रक्रिया करने वाला व्यक्ति सम्म्िलित है, संबंधित गर्भवती स्त्री या उसके नातेदारों या किसी अन्य व्यक्ति को शब्दों, संकेतों द्वारा या किसी अन्य रीति से भ्रूण का लिंग संसूचित नहीं करेगा ।]

6. लिंग अवधारण का प्रतिषेध–इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, — 

(क) कोई भी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र या आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक किसी प्रसवपूर्व   निदान-तकनीक का, जिसके अन्तर्गत भ्रूण के लिंग का अवधारण करने के प्रयोजन के लिए पराश्रव्य लेखन है, अपने केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक में उपयोग नहीं करेगा या नहीं कराएगा; 

(ख) कोई भी व्यक्ति, किसी भ्रूण के लिंग का अवधारण करने के प्रयोजन के लिए किसी प्रसवपूर्व निदान-तकनीक का, जिसके अन्तर्गत पराश्रव्य लेखन है, उपयोग नहीं करेगा या नहीं कराएगा; 

 [(ग) कोई भी व्यक्ति, गर्भ धारण से पूर्व या उसके पश्चात् लिंग का चयन किसी भी ढंग से कारित नहीं करेगा या कारित करवाने के लिए अनुज्ञात नहीं करेगा ।]

अध्याय 4

केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड

7. केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड का गठन–(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन बोर्ड को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करने के लिए एक बोर्ड का, जो केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड के नाम से ज्ञात होगा, गठन करेगी । 

(2) बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, अर्थात्: —

(क) परिवार कल्याण मंत्रालय या विभाग का भारसाधक मंत्री, जो पदेन अध्यक्ष होगा; 

(ख) भारत सरकार का सचिव जो परिवार कल्याण विभाग का भारसाधक है, पदेन उपाध्यक्ष होगा; 

 [(ग) केंद्रीय सरकार द्वारा महिला और बाल विकास, विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग या विधायी विभाग तथा आयुर्विज्ञान और होम्योपैथी की भारतीय पद्धति के भारसाधक केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों का प्रतिनिधित्व करने के लिए, नियुक्त किए गए तीन पदेन सदस्य;]

(घ) केन्द्रीय सरकार का स्वास्थ सेवा महानिदेशक, पदेन; 

(ङ) दस सदस्य, जो निम्नलिखित में से दो-दो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे–

(i) विख्यात चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञ; 

 [(ii) विख्यात स्त्री रोग विज्ञानी और प्रसूतिरोग विज्ञानी या स्त्री रोग या प्रसूति तंत्र का विशेषज्ञ;]

(iii) विख्यात बालचिकित्सा विज्ञानी;

(iv) विख्यात समाज विज्ञानी; और

(v) महिला कल्याण संगठनों के प्रतिनिधि;

(च) तीन महिला संसद् सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा द्वारा और एक राज्य सभा द्वारा निर्वाचित की जाएंगी; 

(छ) चार-सदस्य, जो राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए दो वर्णानुक्रम में और दो उलटे वर्णानुक्रम में केन्द्रीय सरकार द्वारा चक्रानुक्रम से नियुक्त किए जाएंगे :

परन्तु इस खंड के अधीन कोई नियुक्ति, यथास्थिति, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार की सिफारिश पर ही की जाएगी, अन्यथा नहीं;

(ज) केन्द्रीय सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति का या उसके समतुल्य पंक्ति का अधिकारी, जो परिवाल कल्याण का भारसाधक है, पदेन सदस्य-सचिव होगा ।

8. सदस्यों की पदावधि–(1) पदेन सदस्य से भिन्न सदस्य की पदावधि, —

(क) धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (ङ) या खंड (च) के अधीन नियुक्ति की दशा में, तीन वर्ष होगी; । । ।

 [परंतु धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (च) के अधीन निर्वाचित सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह सदस्य, मंत्री या राज्य मंत्री या उप मंत्री अथवा लोक सभा की अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा राज्य सभा की उप सभापति हो जाती है अथवा उस सदन की सदस्य नहीं रह जाती है, जिससे वह निर्वाचित की गई थी, समाप्त हो जाएगी; और] 

(ख) उक्त उपधारा के खंड (छ) के अधीन नियुक्ति की दशा में, एक वर्ष होगी ।  

(2) यदि किसी अन्य सदस्य के पद में कोई आकस्मिक रिक्ति, चाहे वह उसकी मृत्यु, पदत्याग या रुग्णता अथवा अन्य असमर्थता के कारण अपने कृत्यों के निवर्हन में अयोग्यता के कारण होती है तो ऐसी रिक्ति, केन्द्रीय सरकार द्वारा नए सिरे से नियुक्ति करके भरी जाएगी और इस प्रकार नियुक्त सदस्य, उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर उसे ऐसे नियुक्त किया गया है, शेष पदावधि के लिए, पद धारण करेगा ।

(3) उपाध्यक्ष ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो, समय-समय पर, अध्यक्ष द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

(4) सदस्यों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए ।

9. बोर्ड के अधिवेशन–(1) बोर्ड का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अन्तर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं :

परन्तु बोर्ड का अधिवेशन छह माह में कम से कम एक बार होगा ।

(2) अध्यक्ष और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष बोर्ड के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।

(3) यदि किसी कारणवश अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बोर्ड के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(4) ऐसे सभी प्रश्न जो बोर्ड के किसी अधिवेशन के समक्ष आएं, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा विनिश्चित किए जाएंगे और मत बराबर होने की स्थिति में, अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में पीठासीन व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।

(5) पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्य बोर्ड से, ऐसे भत्ते, यदि कोई हों, प्राप्त करेंगे, जो विहित किए जाएं । 

10. रिक्तियों, आदि से बोर्ड की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना–बोर्ड का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि, —

(क) बोर्ड में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या 

(ख) बोर्ड के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या 

(ग) बोर्ड की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है । 

11. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए बोर्ड के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोजन–(1) बोर्ड अपने साथ ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को सहयोजित कर सकेगा जिसकी सहायता या सलाह की वह इस अधिनियम के किसी उपबन्ध को कार्यान्वित करने के लिए वांछा करे । 

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए, बोर्ड द्वारा अपने साथ सहयोजित व्यक्ति को उस प्रयोजन से सुसंगत चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे बोर्ड के अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा । 

12. बोर्ड के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति–(1) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षातापूर्ण निर्वहन में बोर्ड को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए बोर्ड, ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं, उतने अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों को (चाहे प्रतिनियुक्ति पर या अन्यथा) नियुक्त कर सकेगा, जितने वह आवश्यक समझे:

                परन्तु अधिकारियों के ऐसे प्रवर्ग की नियुक्ति, जिन्हें ऐसे विनियमों में विनिर्दिष्ट किया जाए, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से की जाएगी । 

(2) बोर्ड द्वारा नियुक्त प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी, सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होगा और ऐसे पारिश्रमिक का हकदार होगा, जो विनियमों में विनिदिष्ट किया जाए । 

13. बोर्ड के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन–बोर्ड के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष के या इस निमित्त बोर्ड द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और बोर्ड द्वारा जारी की गई सभी अन्य लिखतें, बोर्ड के सदस्य-सचिव, या वैसी ही रीति से इस निमित्त प्राधिकृत बोर्ड के किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।

14. सदस्य के रूप के नियुक्ति के लिए निरर्हताएं–कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हित होगा, यदि वह–

(क) किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है, जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या 

(ख) अनुन्मोचित दिवालिया है; या

(ग) विकृतचित्त का है, और उसे सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है; या 

(घ) सरकार की या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में के किसी निगम की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है; या 

(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में बोर्ड में ऐसा वित्तीय या अन्य हित रखता है जिसके कारण उसके द्वारा सदस्य के रूप में अपने कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ; या

 [(च) केंद्रीय सरकार की राय में, लिंग के अवधारण के लिए प्रसवपूर्व निदान-तकनीक के उपयोग या उन्नयन में या किसी लिंग चयन तकनीक में सहयुक्त रहा है ।]

15. पुनः नियुक्ति के लिए सदस्य की पात्रता–सेवा के ऐसे अन्य निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, कोई व्यक्ति जो सदस्य नहीं रह जाता है, ऐसे सदस्य के रूप में पुनः नियुक्ति के लिए पात्र होगा:

 [परंतु पदेन सदस्य से भिन्न कोई सदस्य लगातार दो अवधियों से अधिक के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा ।]

1[16. बोर्ड के कृत्य–बोर्ड के निम्नलिखित कृत्य होंगे, अर्थात्: — 

(i) प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों, लिंग चयन तकनीकों के उपयोग और उनके दुरुपयोग के विरुद्ध नीति-विषयक मामलों पर केंद्रीय सरकार को सलाह देना;

(ii) अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के कार्यान्वयन का पुनर्विलोकन करना और उन्हें मानीटर करना तथा केंद्रीय सरकार को उक्त अधिनियम और नियमों में परिवर्तन करने के लिए सिफारिश करना; 

(iii) गर्भधारण पूर्व लिंग चयन और गर्भ के लिंग का प्रसवपूर्व अवधारण करने की प्रथा के विरुद्ध, जिसके कारण स्त्री लिंगी भ्रूण वध हो, लोक जागृति पैदा करना;

(iv) आनुवंशिकी सलाह केन्द्रों, आनुवंशिकी प्रयोगशालाओं और आनुवंशिकी क्लिनिकों में कार्यरत व्यक्तियों द्वारा अनुपालन की जाने वाली आचार संहिता अधिकथित करना;

(v) अधिनियम के अधीन गठित विभिन्न निकायों के कार्यपालन का निरीक्षण करना और उसके समुचित और प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए समुचित कदम उठाना;

(vi) कोई अन्य कृत्य जो अधिनियम के अधीन विहित किए जाएं ।]

 [16क. राज्य पर्यवेक्षण बोर्ड और संघ राज्यक्षेत्र पर्यवेक्षण बोर्ड का गठन–(1) विधान-मंडल वाला प्रत्येक राज्य और संघ राज्यक्षेत्र, यथास्थिति, राज्य पर्यवेक्षण बोर्ड या संघ राज्यक्षेत्र पर्यवेक्षण बोर्ड के नाम से ज्ञात एक बोर्ड का गठन करेगा जिसके निम्नलिखित कृत्य होंगे: —

(i) राज्य में गर्भधारणपूर्व लिंग चयन और गर्भ के लिंग का प्रसवपूर्व अवधारण करने की प्रथा के विरुद्ध, जिसके कारण स्त्रीलिंगी भ्रूणवध हो, लोक जागृति पैदा करना; 

(ii) राज्य में कार्यरत समुचित प्राधिकारियों के क्रियाकलापों का पुनर्विलोकन करना और उनके विरुद्ध समुचित कार्रवाई की सिफारिश करना;

(iii) अधिनियम और नियमों के उपबंधों के कार्यान्वयन को मानीटर करना और उनके संबंध में बोर्ड को उपयुक्त सिफारिशें करना; 

(iv) अधिनियम के अधीन राज्य में किए गए विभिन्न क्रियाकलापों की बाबत बोर्ड और केन्द्रीय सरकार को ऐसी समेकित रिपोर्टें भेजना, जो विहित की जाएं; और 

(v) ऐसे अन्य कृत्य, जो अधिनियम के अधीन विहित किए जाएं । 

(2) राज्य बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा: — 

(क) राज्य में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण का भारसाधक मंत्री, जो पदेन अध्यक्ष होगा; 

(ख) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग का भारसाधक सचिव, जो पदेन उपाध्यक्ष होगा; 

(ग) महिला और बाल विकास, समाज कल्याण, विधि और आयुर्विज्ञान तथा होम्योपैथी की भारतीय पद्धति विभागों के भारसाधक पदेन सचिव या आयुक्त अथवा उनके प्रतिनिधि; 

(घ) राज्य सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण या आयुर्विज्ञान तथा होम्योपैथी की भारतीय पद्धति का पदेन निदेशक; 

(ङ) विधान सभा या विधान परिषद् की तीन महिला सदस्य; 

(च) राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए गए दस सदस्य, जिनमें से प्रत्येक दो निम्नलिखित प्रवर्गों से होंगे: —

(i) विख्यात समाज विज्ञानी और विधि विशेषज्ञ;

(ii) गैर सरकारी संगठनों से या अन्यथा विख्यात महिला सक्रियतावादी;

(iii) विख्यात स्त्री रोग विज्ञानी और प्रसूति विज्ञानी या स्त्री रोग या प्रसूति तंत्र के विशेषज्ञ;

(iv) विख्यात बाल चिकित्सक या चिकित्सीय आनुवंशिकी-विज्ञानी;

(v) विख्यात विकिरण चिकित्सा विज्ञानी या सोनोलोजिस्ट;

(छ) एक अधिकारी, जो परिवार कल्याण के भारसाधक संयुक्त निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो और जो पदेन सदस्य-सचिव होगा । 

(3) राज्य बोर्ड की बैठक चार मास में कम से कम एक बार होगी । 

(4) पदेन सदस्य से भिन्न किसी सदस्य की पदावधि तीन वर्ष की होगी ।

(5) पदेन सदस्य से भिन्न किसी सदस्य के पद में रिक्ति होने की दशा में, उसे नई नियुक्ति करके भरा जाएगा ।

(6) यदि विधान सभा का कोई सदस्य या विधान परिषद् का कोई सदस्य, जो राज्य बोर्ड का सदस्य है, मंत्री या विधान सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा विधान परिषद् का सभापति या उपसभापति हो जाता है तो वह राज्य बोर्ड का सदस्य नहीं रहेगा ।

(7) राज्य बोर्ड की गणपूर्ति इसकी कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से होगी ।

(8) राज्य बोर्ड, जब कभी अपेक्षित हो, एक सदस्य को सहयोजित कर सकता है परन्तु सहयोजित सदस्यों की संख्या राज्य बोर्ड की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी ।

(9) सहयोजित सदस्यों की, मताधिकार के सिवाय, वही शक्तियां और कृत्य होंगे जो अन्य सदस्यों के हैं और वे नियमों तथा विनियमों का पालन करेंगे ।

(10) उन विषयों के संबंध में, जो इस धारा में विनिर्दिष्ट नहीं हैं, राज्य बोर्ड उन्हीं प्रक्रियाओं तथा शर्तों का अनुसरण करेगा, जो बोर्ड को लागू हैं ।]

अध्याय 5

समुचित प्राधिकारी और सलाहकार समिति

17. समुचित प्राधिकारी और सलाहकार समिति–(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक समुचित प्राधिकारियों को, प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र के लिए नियुक्त करेगी ।

(2) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक समुचित प्राधिकारियों को, संपूर्ण राज्य या उसके भाग के लिए प्रसवपूर्व लिंग अवधारण की समस्या की व्यापकता को, जिससे स्त्रीलिंगी, भ्रूणवध होता है, ध्यान में रखते हुए, नियुक्त करेगी । 

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन समुचित प्राधिकारियों के रूप में नियुक्त अधिकारी, — 

 [(क) जब संपूर्ण राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के लिए नियुक्त किए जाएं, तब वे निम्नलिखित तीन सदस्यों से मिलकर बनेंगे: — 

(i) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के संयुक्त निदेशक की या उससे ऊपर की पंक्ति का एक अधिकारी या अध्यक्ष; 

(ii) महिला संगठन का प्रतिनिधित्व करने वाली एक विख्यात महिला; और 

(iii) संबंधित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के विधि विभाग का एक अधिकारी: 

परन्तु यह संबंधित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र का कर्तव्य होगा कि वह प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (विनियमन और दुरुपयोग निवारण) संशोधन अधिनियम, 2002 के प्रवृत्त होने के तीन मास के भीतर राज्य या संघ राज्यक्षेत्र स्तरीय बहुसदस्यीय समुचित प्राधिकरण का गठन करे:

परन्तु यह और कि उसमें होने वाली किसी रिक्ति को, उसके होने के तीन मास के भीतर भरा जाएगा;]

(ख) जब राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के किसी भाग के लिए नियुक्त किए जाएं ऐसी अन्य पंक्ति के होंगे, जो, यथास्थिति, राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार उचित समझे । 

(4) समुचित प्राधिकारी के निम्नलिखित कृत्य होंगे, अर्थात्: —

(क) आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक के लिए रजिस्ट्रीकरण मंजूर, निलंबित या रद्द करना;

(ख) आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला और आनुवंशिकी क्लिनिक के लिए विहित मानक लागू करना; 

(ग) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के भंग से संबंधित परिवादों का अन्वेषण करना और तत्काल कार्रवाई करना;

(घ) रजिस्ट्रीकरण के आवेदनों पर तथा रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण की शिकायतों पर उपधारा (5) के अधीन गठित सलाहकार समिति की सलाह लेना और उस पर विचार करना;

 [(ङ) किसी व्यक्ति द्वारा किसी स्थान पर किसी लिंग चयन तकनीक के उपयोग के विरुद्ध स्वप्रेरणा से या उसकी जानकारी में लाए जाने पर उपयुक्त विधिक कार्रवाई करना और ऐसे मामले में स्वतंत्र रूप से अन्वेषण भी आरंभ करना; 

(च) लिंग चयन या प्रसवपूर्व लिंग अवधारण की प्रथा के विरुद्ध जनसाधारण में जागरुकता पैदा करना; 

(छ) अधिनियम और नियमों के उपबंधों के कार्यान्वयन का पर्यवेक्षण करना; 

(ज) प्रौद्योगिकी या सामाजिक दशाओं में परिवर्तनों के अनुसार नियमों में अपेक्षित उपांतरणों के संबंध में बोर्ड और राज्य बोर्डों को सिफारिश करना; 

(झ) रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण के लिए परिवाद के अन्वेषण के पश्चात् सलाहकार समिति द्वारा की गई सिफारिशों पर कार्रवाई करना ।]

(5) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार समुचित प्राधिकारी को उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने के लिए प्रत्येक समुचित प्राधिकारी के लिए एक सलाहकार समिति गठित करेगी और सलाहकार समिति के सदस्यों में से एक को उसका अध्यक्ष नियुक्त करेगी ।

(6) सलाहकार समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्: —

(क) स्त्री रोग विशेषज्ञ, प्रसूति विज्ञानी, बालचिकित्सा विज्ञानी और चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञों में से तीन आयुर्विज्ञान विशेषज्ञ; 

(ख) एक विधि विशेषज्ञ; 

(ग) यथास्थिति, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र के सूचना और प्रचार से संबंधित विभाग का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकारी; 

(घ) तीन विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता जिनमें कम से कम एक महिला संगठनों के प्रतिनिधियों में से होगा ।

 [(7) कोई भी व्यक्ति, जो लिंग के अवधारण या लिंग चयन की प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों के उपयोग या उन्नयन में सहयुक्त रहा है, सलाहकार समिति का सदस्य नियुक्त नहीं किया जाएगा ।] 

(8) सलाहकार समिति का अधिवेशन, रजिस्ट्रीकरण के किसी आवेदन पर या रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण के किसी परिवाद पर विचार करने के लिए और उस पर सलाह देने के लिए जब कभी वह उचित समझे या समुचित प्राधिकारी के अनुरोध पर किया जा सकेगा:

परन्तु दो अधिवेशनों के बीच की अवधि विहित अवधि से अधिक नहीं होगी ।

(9) वे निबन्ध और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए कोई व्यक्ति सलाहकार समिति में नियुक्त किया जा सकेगा और ऐसी समिति द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए । 

 [17क. समुचित प्राधिकारियों की शक्तियां–समुचित प्राधिकारी को निम्नलिखित विषयों की बाबत शक्तियां होंगी, अर्थात्: —

(क) ऐसे किसी व्यक्ति को समन करना, जिसके कब्जे में इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के उल्लंघन से संबंधित कोई जानकारी है;

(ख) खंड (क) से संबंधित किसी दस्तावेज या भौतिक पदार्थ को पेश करना; 

(ग) ऐसे किसी स्थान के संबंध में तलाशी वारंट जारी करना, जिसके बारे में संदेह है कि वह लिंग चयन तकनीक या प्रसवपूर्व लिंग अवधारण में लिप्त है; और 

(घ) ऐसा कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।]

अध्याय 6

आनुवंशिकी सलाह केन्द्रों, आनुवंशिकी प्रयोगशालाओं और आनुवंशिकी क्लिनिकों का रजिस्ट्रीकरण

 [18. आनुवंशिकी सलाह केन्द्रों, आनुवंशिकी प्रयोगशालाओं या आनुवंशिकी क्लिनिकों का रजिस्ट्रीकरण–(1) कोई भी व्यक्ति, प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (विनियमन और दुरुपयोग निवारण) संशोधन अधिनियम, 2002 के प्रारंभ के पश्चात् कोई आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक, जिसके अंतर्गत ऐसा क्लिनिक, प्रयोगशाला या केंद्र भी है, जिसमें अल्ट्रासांउड मशीन या इमेजिंग मशीन या स्कैनर या कोई अन्य ऐसी प्रौद्योगिकी है, जो भ्रूण के लिंग का अवधारण करने और लिंग का चयन करने में समर्थ है, या उनमें से कोई सेवाएं प्रदान करता है तब तक नहीं खोलेगा जब तक कि ऐसा केंद्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाता है ।]

(2) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन समुचित अधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से किया जाएगा और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए । 

(3) प्रत्येक आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक जो भागतः या अनन्यतः इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व धारा 4 में उल्लिखित किसी प्रयोजन के लिए प्रसवपूर्व निदान-तकनीक संबंधी सलाह देने या उनके उपयोग करने में लगा हुआ है, ऐसे प्रारंभ की तारीख से साठ दिन के भीतर रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करेगा । 

(4) धारा 6 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक ऐसा आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक जो प्रसवपूर्व निदान-तकनीक संबंधी सलाह देने या उनके उपयोग करने में लगा हुआ है, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से छह मास की समाप्ति पर, जब तक कि ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक द्वारा रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन नहीं किया गया हो और उसका इस प्रकार पृथक्तः या संयुक्ततः, रजिस्ट्रीकरण नहीं किया जाता है अथवा तब जब कि ऐसे आवदेन का निपटारा कर दिया जाता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, ऐसी किसी तकनीक संबंधी सलाह देना या उनका उपयोग बन्द कर देगा ।  

(5) कोई आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक इस अधिनियम के अधीन तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि समुचित प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक ऐसी सुविधाएं प्रदान करने, ऐसे उपस्कर का अनुरक्षण करने और स्तरमान बनाए रखने की स्थिति में हैं, जो विहित किए जाएं । 

19. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र–(1) समुचित प्राधिकारी, जांच करने के पश्चात् और अपना यह समाधान कर लेने के पश्चात् कि आवेदक ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन कर दिया है, और इस निमित्त सलाहकार समिति की सलाह को ध्यान में रखते हुए, यथास्थिति, आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक को, पृथक्तः या संयुक्ततः विहित प्ररूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा ।

(2) यदि, जांच करने के पश्चात् और आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और सलाहकार समिति की सलाह को ध्यान में रखते हुए, समुचित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक ने इस अधिनियम या नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं किया है तो वह रजिस्ट्रीकरण संबंधी आवेदन को, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नामंजूर कर देगा ।

(3) प्रत्येक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का, ऐसी रीति से और ऐसी अवधि के पश्चात् तथा ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर, जो विहित की जाए, नवीकरण किया जाएगा ।

(4) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, रजिस्ट्रीकृत आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक द्वारा अपने कारबार के स्थान में किसी सहजदृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जाएगा । 

20. रजिस्ट्रीकरण का रद्दकरण या निलम्बन–(1) समुचित प्राधिकारी, स्वप्रेरणा से या परिवाद किए जाने पर, आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक को यह हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना जारी कर सकेगा कि उसका रजिस्ट्रीकरण, सूचना में उल्लिखित कारणों से निलम्बित या रद्द क्यों न कर दिया जाए ।

(2) यदि आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और सलाहकार समिति की सलाह को ध्यान में रखते हुए, समुचित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम या नियमों के उपबन्धों में से किसी को भंग किया गया है तो वह किसी दांडिक कार्यवाही पर, जो वह ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक के विरुद्ध कर सकेगा, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यथास्थिति, उसके रजिस्ट्रीकरण को, ऐसी अवधि के लिए जो वह उचित समझे, निलम्बित कर सकेगा या, उसके रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर सकेगा । 

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि समुचित प्राधिकारी की यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह, उसके लिए जो कारण है उन्हें लेखबद्ध करके, उपधारा (1) में निर्दिष्ट ऐसी कोई सूचना जारी किए बिना, किसी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक के रजिस्ट्रीकरण को निलंबित कर सकेगा । 

21. अपील–आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक, समुचित प्राधिकारी द्वारा धारा 20 के अधीन पारित रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण के आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर, ऐसे आदेश के विरुद्ध विहित रीति से, —

(i) जहां वह अपील केन्द्रीय समुचित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध है वहां केन्द्रीय सरकार को; और

(ii) जहां वह अपील राज्य के समुचित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध है वहां राज्य सरकार को,

अपील कर सकेगा ।

अध्याय 7

अपराध और शास्तियां

 [22. गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व लिंग अवधारण संबंधी विज्ञापन का प्रतिषेध और उसके उल्लंघन के लिए दंड–(1) कोई भी व्यक्ति, संगठन, आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक, जिसके अंतर्गत ऐसा क्लिनिक, प्रयोगशाला या केंद्र भी है, जिसमें अल्ट्रासाउंड मशीन, इमेजिंग मशीन या स्कैनर या कोई अन्य ऐसी प्रौद्योगिकी है, जो भ्रूण के लिंग का अवधारण करने और लिंग चयन करने में समर्थ है, प्रसवपूर्व लिंग अवधारण या गर्भधारण पूर्व लिंग चयन की सुविधाओं के बारे में, जो ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला, क्लिनिक या किसी अन्य स्थान पर उपलब्ध है, कोई विज्ञापन, किसी भी रूप में, जिसके अंतर्गत इंटरनेट भी है, जारी, प्रकाशित, वितरित या संसूचित नहीं करेगा या जारी, प्रकाशित, वितरित या संसूचित नहीं करवाएगा ।  

(2) कोई भी व्यक्ति या संगठन, जिसके अंतर्गत आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक भी है, किसी भी प्रकार के साधनों के द्वारा, चाहे वैज्ञानिक हो या अन्यथा, लिंग के प्रसवपूर्व अवधारण या गर्भधारण पूर्व चयन के संबंध में किसी रीति में कोई विज्ञापन जारी, प्रकाशित, वितरित, संसूचित नहीं करेगा या जारी, प्रकाशित, वितरित या संसूचित नहीं करवाएगा ।

(3) ऐसा कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, ऐसे कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।  

स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, विज्ञापन” के अंतर्गत कोई सूचना, परिपत्र, लेबल, आवेष्टक या कोई अन्य दस्तावेज है, जिसके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक या मुद्रित रूप में इंटरनेट के या किसी अन्य मीडिया के माध्यम से विज्ञापन भी है तथा इसमें पट्ट विज्ञापन, दिवार-पेंटिंग, संकेत, प्रकाश, ध्वनि, धुंआ या गैस के माध्यम से किया गया कोई दृश्यरूपण भी है ।] 

23. अपराध और शास्तियां–(1) कोई चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी या कोई व्यक्ति, जो आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक का स्वामी है या ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक में नियोजित है तथा अपनी वृत्तिक या तकनीकी सेवाएं, ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक को चाहे वे अवैतनिक आधार पर हों या अन्यथा, प्रदान करता है, और जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर, कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा । 

1[(2) रजिस्टीकृत चिकित्सा व्यवसायी का नाम समुचित प्राधिकारी द्वारा संबंधित राज्य आयुर्विज्ञान परिषद् को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए, जिसके अंतर्गत रजिस्ट्रीकरण का निलंबन, यदि न्यायालय द्वारा आरोप विरचित किए जाते हैं, और मामले के निपटाए जाने तक, और सिद्धदोष ठहराए जाने पर उसके नाम को प्रथम अपराध के लिए पांच वर्ष की अवधि के लिए और पश्चात्वर्ती अपराध के लिए स्थायी रूप से परिषद् के रजिस्टर से हटाया जाना भी है, रिपोर्ट किया जाएगा ।

(3) कोई व्यक्ति, जो किसी आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक या अल्ट्रासाउंड क्लिनिक या इमेजिंग क्लिनिक की या किसी चिकित्सा आनुवंशिकीविज्ञानी, स्त्री रोग विशेषज्ञ, सोनोलोजिस्ट, इमेजिंग विशेषज्ञ या रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी या किसी अन्य व्यक्ति की, धारा 4 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए किसी गर्भवती स्त्री पर लिंग चयन के लिए या प्रसवपूर्व निदान तकनीक का उपयोग करने के लिए सहायता लेगा, प्रथम अपराध के लिए कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा दंडनीय होगा ।  

(4) शंकाओं को दूर करने के लिए, यह उपबंध किया जाता है कि उपधारा (3) के उपबंध ऐसी स्त्री को लागू नहीं होंगे जिसे ऐसी निदान तकनीक कराने या ऐसा लिंग चयन करने के लिए विवश किया गया हो ।] 

1[24. प्रसवपूर्व निदान-तकनीकों के संचालन की दशा में उपधारणा–भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1)  में किसी बात के होते हुए भी, न्यायालय, जब तक प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता है, यह उपधारणा करेगा कि गर्भवती स्त्री प्रसवपूर्व निदान-तकनीक का धारा 4 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजन के लिए उपयोग कराने के लिए, यथास्थिति, उसके पति या किसी अन्य नातेदार द्वारा विवश की गई थी और ऐसा व्यक्ति धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन अपराध के दुष्प्रेरण के लिए दायी होगा और उस धारा के अधीन विनिर्दिष्ट अपराध के लिए दंडनीय होगा ।]

25. अधिनियम या नियमों के उन उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति जिनके लिए किसी विनिर्दिष्ट दंड का उपबंध नहीं किया गया है–जो कोई इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उन उपबंधों का उल्लंघन करेगा, जिनके लिए इस अधिनियम में अन्य किसी शास्ति का उपबंध नहीं है वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से और जहां ऐसा उल्लंघन जारी रहता है वहां अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन ऐसे प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् जारी रहता है, पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

26. कम्पनियों द्वारा अपराध–(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,–

(क) कम्पनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और 

(ख) फर्म के संबध में, निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 

27. अपराध का संज्ञेय, अजमानतीय और अशमनीय होना–इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अशमनीय होगा । 

28. अपराधों का संज्ञान–(1) कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, —

(क) संबंधित समुचित प्राधिकारी द्वारा अथवा, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या समुचित प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा; या 

(ख) ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसने अभिकथित अपराध की और न्यायालय में परिवाद करने के अपने आशय की कम से कम [पन्द्रह दिन] की सूचना विहित रीति से समुचित प्राधिकारी को दी है, 

किए गए परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं ।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजन के लिए व्यक्ति” के अन्तर्गत कोई सामाजिक संगठन है । 

(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा । 

(3) जहां कोई परिवाद उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन किया गया है वहां न्यायालय, ऐसे व्यक्ति द्वारा मांग किए जाने पर, समुचित प्राधिकारी को, उसके कब्जे में के सुसंगत अभिलेखों की प्रतियां ऐसे व्यक्ति को उपलब्ध कराने का निदेश दे सकेगा ।

अध्याय 8

प्रकीर्ण

29. अभिलेख का रखा जाना–(1) इस अधिनियम और नियमों के अधीन रखे जाने के लिए अपेक्षित सभी अभिलेखों, चार्टों, प्ररूपों, रिपोर्टों, सहमति पत्रों तथा अन्य सभी दस्तावेजों का, दो वर्ष की अवधि तक या ऐसी अवधि तक, जो विहित की जाए, परिरक्षण किया जाएगा:

परन्तु यदि किसी आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक के विरुद्ध कोई दांडिक या अन्य कार्यवाही संस्थित की जाती है तो ऐसे केन्द्र, प्रयोगशाला या क्लिनिक के अभिलेखों और अन्य सभी दस्तावेजों का ऐसी कार्यवाही के अंतिम निपटारे तक परिरक्षण किया जाएगा ।

(2) ऐसे सभी अभिलेख, सभी युक्तियुक्त समयों पर, समुचित प्राधिकारी को या समुचित प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति को निरीक्षण के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे । 

30. तलाशी लेने और अभिलेखों, आदि के अभिग्रहण करने की शक्ति— [(1) यदि समुचित प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक या किसी अन्य स्थान में किया गया है या किया जा रहा है तो ऐसा प्राधिकारी या इस निमित्त प्राधिकृत कोई अधिकारी, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, सभी युक्तियुक्त समयों पर, ऐसे आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला, आनुवंशिकी क्लिनिक या किसी अन्य स्थान में, ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जैसी ऐसा प्राधिकारी या अधिकारी आवश्यक समझे, प्रवेश कर सकेगा और तलाशी ले सकेगा और वहां पाए गए किसी अभिलेख, रजिस्टर, दस्तावेज, पुस्तक, पुस्तिका, विज्ञापन या किसी अन्य भौतिक पदार्थ की परीक्षा कर सकेगा और उसे अभिगृहीत और मुहरबन्द कर सकेगा, यदि ऐसे प्राधिकारी या अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उससे इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किए जाने का साक्ष्य मिल सकता है ।]

(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के तलाशी और अभिग्रहण से संबंधित उपबन्ध, जहां तक हो सके, इस अधिनियम के अधीन ली गई प्रत्येक तलाशी या अभिग्रहण को लागू होंगे । 

31. स-ावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण–इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में स-ावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या समुचित प्राधिकारी अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा या प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

 [31क. कठिनाइयों का दूर किया जाना–(1) यदि प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (विनियमन और दुरुपयोग निवारण) संशोधन अधिनियम, 2002 के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध बना सकेगी, जो उक्त अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो उक्त कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :

परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश प्रसवपूर्व निदान-तकनीक (विनियमन और दुरुपयोग निवारण) संशोधन अधिनियम, 2002 के प्रारंभ की तारीख से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा । 

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जा सकेगा ।]

32. नियम बनाने की शक्ति–(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात्: —

1[(i) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन किसी रजिस्ट्रीकृत आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक में नियोजित व्यक्तियों के लिए न्यूनतम अर्हताएं; 

(iक) वह रीति, जिसमें धारा 4 की उपधारा (3) के परंतुक के अधीन किसी गर्भवती स्त्री पर पराश्रव्य लेखन करने वाला व्यक्ति क्लिनिक में उसका अभिलेख रखेगा;]

(ii) वह प्ररूप जिसमें गर्भवती स्त्री की धारा 5 के अधीन सहमति अभिप्राप्त की जानी है;

(iii) धारा 8 की उपधारा (4) के अधीन केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड के सदस्यों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;

(iv) पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्यों को धारा 9 की उपधारा (5) के अधीन अनुज्ञेय भत्ते; 

(v) धारा 17 की उपधारा (8) के परन्तुक के अधीन सलाहकार समिति के किन्हीं दो अधिवेशनों के बीच की अवधि; 

 [(ivक) आनुवंशिकी सलाह केंद्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला और आनुवंशिकी क्लिनिकों में कार्यरत व्यक्तियों द्वारा पालन की जाने वाली आचार-संहिता जिसे धारा 16 के खंड (iv) के अधीन केन्द्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड द्वारा अधिकथित किया जाएगा;

(ivख) वह रीति जिसमें राज्य और संघ राज्यक्षेत्र पर्यवेक्षण बोर्डों द्वारा धारा 16क की उपधारा (1) के खंड (iv) के अधीन उक्त अधिनियम के अधीन राज्य में किए गए विभिन्न क्रियाकलापों के संबंध में बोर्ड और केंद्रीय सरकार को रिपोर्ट दी जाएगी;  

(ivग) धारा 17क के खंड (घ) के अधीन किसी अन्य मामले में समुचित प्राधिकारी को सशक्त करना;] 

(vi) वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए किसी व्यक्ति को सलाहकार समिति में नियुक्त किया जा सकेगा और ऐसी समिति द्वारा धारा 17 की उपधारा (9) के अधीन अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया; 

(vii) वह प्ररूप जिसमें और रीति जिससे धारा 18 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया जाएगा और उसके लिए संदेय फीस;

(viii) धारा 18 की उपधारा (5) के अधीन आनुवंशिकी सलाह केन्द्र, आनुवंशिकी प्रयोगशाला या आनुवंशिकी क्लिनिक द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाएं, अनुरक्षित किए जाने वाले उपस्कर और बनाए रखे जाने वाले अन्य मानक; 

(ix) वह प्ररूप जिसमें धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया जाएगा; 

(x) वह रीति जिससे और वह अवधि जिसके पश्चात् धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का नवीकरण किया जाएगा और ऐसे नवीकरण के लिए संदेय फीस;

(xi) वह रीति जिससे धारा 21 के अधीन अपील की जा सकेगी;

(xii) वह अवधि जिस तक धारा 29 की उपधारा (1) के अधीन अभिलेखों, चार्टों, आदि का परिरक्षण किया जाएगा; 

(xiii) वह रीति जिससे दस्तावेज, अभिलेख, सामग्री आदि का अभिग्रहण किया जाएगा और वह रीति जिससे अभिग्रहण सूची तैयार की जाएगी तथा उस व्यक्ति को दी जाएगी जिसकी अभिरक्षा से ऐसे दस्तावेज, अभिलेख या सामग्री धारा 30 की उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत की गई थी; 

(xiv) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।

33. विनियम बनाने की शक्ति--बोर्ड, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे विनियम, जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से असंगत न हों, निम्नलिखित का उपबन्ध करने के लिए बना सकेगा, अर्थात्: —

(क) धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड के अधिवशनों का समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया तथा उन सदस्यों की संख्या जिनसे मिलकर गणपूर्ति होगी; 

(ख) वह रीति जिससे कोई व्यक्ति धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड के साथ अस्थायी रूप से सहयोजित किया जा सकेगा; 

(ग) धारा 12 के अधीन नियुक्त बोर्ड के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति का ढंग, सेवा की शर्तें तथा वेतनमान और भत्ते; 

(घ) साधारणतः बोर्ड के कार्यकलापों का दक्ष संचालन । 

34.  नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना–इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन, उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु उस नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

Note : सभी तरह के एक्ट देखने और समझकर सरल माध्यम से समझाने लिए IPC का सहारा लिया गया है और आप भी भारतीय न्याय व्यवस्था में अपना भरोसा बनाकर इन्हें पढ़े और ज्यादा बेहतर समझ के लिए किसी अच्छे वकील से संपर्क करें. यदि आपको कोई त्रुटी मिले तो comment करके हमें बताये हम जुरूर सुधारने का प्रयास करेंगे. आर्टिकल या पोस्ट में लिखी किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *